अब दुनिया देखेगी सरिस्का की सफलता की कहानी: दो साल में तैयार होगी टाइगर पुनर्वास पर डॉक्यूमेंट्री
अलवर। कभी बाघों से पूरी तरह खाली हो चुके सरिस्का टाइगर रिजर्व की पुनर्जन्म की कहानी अब पूरी दुनिया तक पहुंचेगी। देश में पहली बार सफल हुए टाइगर ट्रांसलोकेशन (पुनर्वास) अभियान की इस ऐतिहासिक उपलब्धि को डॉक्यूमेंट्री के रूप में फिल्माया जाएगा। मशहूर वाइल्डलाइफ फिल्म मेकर सुब्बैय्या नल्ला मुथु अगले दो वर्षों तक सरिस्का के जंगल, बाघों, वनकर्मियों और यहां के संरक्षण मॉडल को कैमरे में कैद करेंगे। यह डॉक्यूमेंट्री वर्ष 2028 में सरिस्का में बाघों के पुनर्वास के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रदर्शित की जाएगी।
इस फिल्म में वर्ष 2008 में रणथंभौर से सरिस्का लाए गए पहले बाघ से लेकर वर्तमान में यहां बाघों की संख्या 56 तक पहुंचने की पूरी यात्रा दिखाई जाएगी। यह केवल बाघों की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं होगी, बल्कि संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन, वनकर्मियों की मेहनत, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और प्रकृति के पुनर्जीवन की प्रेरक गाथा भी होगी।
वाइल्डलाइफ फिल्म मेकर सुब्बैय्या नल्ला मुथु ने बताया कि वे पिछले करीब 20 वर्षों से वाइल्डलाइफ फिल्म निर्माण से जुड़े हैं और उन्होंने देश में पहली बार हुए सरिस्का टाइगर ट्रांसलोकेशन को भी बेहद करीब से देखा है। उनके अनुसार, देश के अनेक टाइगर रिजर्व का अध्ययन और फिल्मांकन करने के बाद भी सरिस्का सबसे अलग नजर आता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पूरी तरह समाप्त हो चुकी बाघों की आबादी को दोबारा बसाया गया, जो दुनिया में वन्यजीव संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि सरिस्का यह साबित करता है कि यदि किसी जंगल से शीर्ष शिकारी यानी बाघ खत्म हो जाएं तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है, लेकिन वैज्ञानिक प्रयास, मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर संरक्षण से उस जंगल को फिर जीवंत बनाया जा सकता है। यही संदेश इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से विश्वभर तक पहुंचाया जाएगा।
दो वर्षों तक हर मौसम में होगी शूटिंग
नल्ला मुथु ने बताया कि एक अच्छी वाइल्डलाइफ डॉक्यूमेंट्री कुछ महीनों में तैयार नहीं होती। इसके लिए वर्षों तक जंगल में रहकर हर मौसम, हर परिस्थिति और वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन करना पड़ता है। आगामी दो वर्षों में सरिस्का की हर गतिविधि को कैमरे में रिकॉर्ड किया जाएगा। इसमें विभिन्न ऋतुओं में जंगल के बदलते स्वरूप, बाघों का व्यवहार, शावकों का विकास, जलस्रोत, जैव विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य को विस्तार से फिल्माया जाएगा।
डॉक्यूमेंट्री में केवल बाघ ही नहीं, बल्कि वन विभाग के कर्मचारियों की चुनौतियां, जंगल संरक्षण की रणनीतियां, गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया, स्थानीय समुदाय की भूमिका, मानव-वन्यजीव संघर्ष, वैज्ञानिक प्रबंधन और संरक्षण के दौरान सामने आई कठिनाइयों को भी प्रमुखता से दिखाया जाएगा। साथ ही यह भी बताया जाएगा कि किन परिस्थितियों में सरिस्का ने फिर से अपनी पहचान बनाई।
कई प्रतिष्ठित टाइगर रिजर्व पर बना चुके हैं फिल्में
सुब्बैय्या नल्ला मुथु देश के जाने-माने वाइल्डलाइफ फिल्म मेकर हैं। वे अब तक रणथंभौर टाइगर रिजर्व पर पांच, ताड़ोबा पर तीन तथा सरिस्का और पन्ना टाइगर रिजर्व पर एक-एक डॉक्यूमेंट्री तैयार कर चुके हैं। रणथंभौर की विश्व प्रसिद्ध बाघिन ‘मछली’ और उसके परिवार पर बनाई गई उनकी चर्चित फिल्म को पूरा करने में करीब पांच वर्ष का समय लगा था। उन्होंने बताया कि जंगल की वास्तविक कहानी कैमरे में कैद करने के लिए धैर्य, अध्ययन और वर्षों की मेहनत जरूरी होती है।
अध्ययन और संरक्षण का जीवंत मॉडल बना सरिस्का
नल्ला मुथु का मानना है कि सरिस्का आज वन्यजीव शोध और संरक्षण अध्ययन के लिए एक आदर्श प्रयोगशाला बन चुका है। यहां अभी भी कुछ गांवों का विस्थापन शेष है, फिर भी बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वहीं जिन क्षेत्रों से गांवों का सफलतापूर्वक पुनर्वास किया गया, वहां बाघों का प्रजनन भी तेजी से बढ़ा है। ऐसे में संरक्षण, पुनर्वास और मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण अध्ययन सरिस्का में किए जा सकते हैं।
उन्होंने बताया कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने में सरिस्का प्रशासन, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), भारत सरकार और राजस्थान सरकार का सहयोग रहेगा। उनका उद्देश्य केवल एक फिल्म बनाना नहीं, बल्कि सरिस्का की उस ऐतिहासिक यात्रा को दुनिया के सामने लाना है, जिसने यह साबित किया कि मजबूत संरक्षण नीति और सतत प्रयासों से किसी भी जंगल को फिर से बाघों की दहाड़ से आबाद किया जा सकता है।
