सरिस्का-पन्ना के सफल बाघ पुनर्स्थापन ने भारत को दिलाई वैश्विक पहचान: भूपेंद्र यादव
अलवर। कभी बाघों से पूरी तरह खाली हो चुके सरिस्का टाइगर रिजर्व की पहचान आज विश्व के सफल वन्यजीव संरक्षण मॉडल के रूप में हो रही है। वर्ष 2008 में शुरू हुए वैज्ञानिक बाघ पुनर्स्थापन कार्यक्रम की सफलता ने न केवल सरिस्का, बल्कि पन्ना टाइगर रिजर्व को भी वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का और पन्ना में सफल बाघ पुनर्स्थापन भारत की वैज्ञानिक क्षमता, संरक्षण नीति और सामूहिक प्रयासों का ऐसा उदाहरण है, जिसे आज पूरी दुनिया देख रही है।
रविवार को अलवर में आयोजित ‘सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन’ विषयक राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक समय ऐसा था जब सरिस्का से बाघ पूरी तरह समाप्त हो चुके थे, लेकिन आज यहां 56 बाघों की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक सोच, प्रभावी प्रबंधन और सतत संरक्षण से असंभव दिखने वाला लक्ष्य भी हासिल किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सरिस्का में बाघों की वापसी केवल वन्यजीवों की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति के पुनर्जागरण, वैज्ञानिक संरक्षण और सामूहिक संकल्प की प्रेरक गाथा है। यही कारण है कि आज सरिस्का और पन्ना का मॉडल विश्वभर के वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए अध्ययन और अनुसरण का विषय बन चुका है।
दुनिया के 75 प्रतिशत जंगली बाघ भारत में
केंद्रीय मंत्री यादव ने कहा कि भारत ने वन्यजीव संरक्षण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ते हुए उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। आज विश्व के लगभग 75 प्रतिशत जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं, जो देश की संरक्षण नीति, जनभागीदारी और प्रकृति के प्रति सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश में 58 टाइगर रिजर्व हैं, जिनमें करीब 3,682 बाघ निवास करते हैं। पिछले एक दशक में टाइगर रिजर्व की संख्या और संरक्षित क्षेत्रों का लगातार विस्तार हुआ है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में आवास का विखंडन, शिकार प्रजातियों की कमी और सीमित बाघ आबादी जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, जिन पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कार्य किया जा रहा है।
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन का रोडमैप, बाघ पुनर्स्थापन एवं पुनर्बहाली पर आधारित पुस्तक तथा प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक प्रगति रिपोर्ट का भी विमोचन किया।
अलवर को हराभरा बनाने का संकल्प
भूपेंद्र यादव ने कहा कि अलवर को केवल सरिस्का के लिए ही नहीं, बल्कि हरियाली के लिए भी देशभर में पहचान दिलाई जाएगी। उन्होंने बताया कि जिले के 162 पार्कों के विकास के साथ-साथ चारों ओर की पहाड़ियों पर एक करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह अभियान आगामी दो वर्षों में पूरा किया जाएगा और इसकी शुरुआत जुलाई से होगी। इससे अलवर आने वाले पर्यटकों को पूरे जिले में हरियाली का नया स्वरूप देखने को मिलेगा।
हर साल 28 जून को मनाया जाएगा ‘सरिस्का डे’
प्रदेश के वन मंत्री संजय शर्मा ने घोषणा की कि राजस्थान सरकार ने हर वर्ष 28 जून को ‘सरिस्का डे’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2003-04 में सरिस्का पूरी तरह बाघ विहीन हो गया था। इसके बाद 28 जून 2008 को रणथंभौर से हेलीकॉप्टर के माध्यम से पहले नर बाघ का सफल पुनर्स्थापन किया गया, जिसने देश में बाघ पुनर्वास का नया इतिहास रचा।
उन्होंने कहा कि बाद में रणथंभौर से लाई गई बाघिन एसटी-2 ‘राजमाता’ ने सरिस्का को दोबारा बाघों से आबाद करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसके वंश से ही आज सरिस्का में बड़ी संख्या में बाघ मौजूद हैं। वर्ष 2023 में जहां सरिस्का में 31 बाघ थे, वहीं 2026 में यह संख्या बढ़कर 56 हो गई है। महज 18 वर्षों में शून्य से 56 बाघों तक पहुंचना देश में बाघ संरक्षण का अनूठा उदाहरण है।
ग्रामीणों की भागीदारी से मजबूत हुआ संरक्षण
वन मंत्री ने कहा कि सरिस्का की इस सफलता के पीछे वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की मेहनत के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों का भी बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि किसी भी टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण तभी सफल हो सकता है, जब स्थानीय समुदाय उसकी जिम्मेदारी को साझा करे।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार टाइगर रिजर्व क्षेत्र के ग्रामीणों को वन उत्पादों और ईको-टूरिज्म से रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य कर रही है। अब तक संभाग स्तर पर आयोजित होने वाले वन मेलों को जिला स्तर तक विस्तार दिया जाएगा। साथ ही, टाइगर रिजर्व के भीतर बसे गांवों के स्वैच्छिक विस्थापन के लिए नया पैकेज भी लागू किया गया है, जिससे ग्रामीणों की सहमति से पुनर्वास प्रक्रिया को गति मिलेगी।
राष्ट्रीय कार्यशाला में देशभर के वन्यजीव विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, वन अधिकारियों और संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया तथा बाघ संरक्षण, पुनर्स्थापन और भविष्य की रणनीतियों पर विस्तार से मंथन किया।
