Sunday, October 18, 2026
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2012 में कृषि विभाग के प्रशिक्षण से मिली आधुनिक खेती की राह, पॉलीहाउस-शेडनेट के साथ ड्रिप सिंचाई और जैविक तकनीक अपनाई; 8 से 10 परिवारों को मिला रोजगार

प्रेम पाठक

 

अलवर जिले के गुजुकी गांव के किसान महेंद्र की खेती की कहानी उस दौर से शुरू होती है, जब किसानों के बीच हाईटेक और संरक्षित खेती को लेकर जागरूकता आज की तुलना में काफी सीमित थी। वर्ष 2012 में उनके बड़े भाई ने कृषि विभाग से प्रशिक्षण लिया और इसी प्रशिक्षण ने परिवार की खेती की दिशा बदल दी। प्रशिक्षण के दौरान ड्रिप सिंचाई, पॉलीहाउस, शेडनेट हाउस, सोलर सिस्टम और फार्म पॉन्ड जैसी तकनीकों की जानकारी मिली तो परिवार ने परंपरागत खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाने का फैसला किया।

शुरुआत एक पॉलीहाउस से हुई, लेकिन करीब डेढ़ दशक में यह प्रयोग धीरे-धीरे एक बड़े खेती मॉडल में बदल गया। आज महेंद्र करीब 3 एकड़ क्षेत्र में संरक्षित और आधुनिक तरीके से खेती कर रहे हैं। इनमें करीब 2 एकड़ क्षेत्र पॉलीहाउस और 1 एकड़ शेडनेट हाउस के रूप में विकसित है। खास बात यह है कि इस खेती से केवल महेंद्र के परिवार की आजीविका नहीं चल रही, बल्कि करीब 8 से 10 परिवार भी प्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जुड़े हुए हैं।

आधुनिक खेती बनी परिवार की पहचान

महेंद्र बताते हैं कि वर्ष 2012 में परिवार का मुख्य उद्देश्य खेती से होने वाली आमदनी बढ़ाना था। इसी सोच के साथ उन्होंने परंपरागत खेती के बजाय संरक्षित खेती की ओर कदम बढ़ाया। शुरुआत में परिवार ने अलग-अलग सब्जियों पर प्रयोग किए। खीरे के अलावा शिमला मिर्च और टमाटर की खेती भी की गई, लेकिन बाजार की मांग, फसल तैयार होने में लगने वाला समय और बिक्री की संभावनाओं को देखते हुए खीरे की खेती अधिक उपयोगी लगी।

इसके बाद खीरा परिवार की प्रमुख फसल बन गया। महेंद्र के मुताबिक खीरे की फसल कम समय में तैयार हो जाती है और वर्ष में दो बार उत्पादन लेने का अवसर भी मिल जाता है। बाजार में इसकी मांग बनी रहने के कारण उन्होंने खीरे की खेती को प्राथमिकता दी और समय के साथ उत्पादन तकनीक में लगातार सुधार करते गए।

महेंद्र के खेती के प्रयोगों की कृषि विशेषज्ञों ने भी सराहना की है। अलवर के पूर्व जिला कलक्टर जितेंद्र सोनी ने भी उनके प्रयासों की तारीफ की थी। इससे किसान महेंद्र को आधुनिक खेती के प्रयोगों को और आगे बढ़ाने का प्रोत्साहन मिला।

पानी की चुनौती का ड्रिप सिंचाई से समाधान

अलवर जैसे क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता किसानों के सामने बड़ी चुनौती रहती है। महेंद्र ने खेती के शुरुआती दौर में ही इस समस्या को समझते हुए ड्रिप सिंचाई को अपनाया। वर्तमान में पॉलीहाउस के साथ खुले खेत में भी ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ड्रिप सिंचाई में पानी पौधों की जरूरत के अनुसार सीधे जड़ों तक पहुंचता है। इससे खेत में पानी का अनावश्यक बहाव कम होता है और पौधों को नियमित नमी मिलती रहती है। महेंद्र का मानना है कि सीमित पानी वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।

उनके खेत में वर्तमान में स्ट्रॉबेरी, शिमला मिर्च, टमाटर, गोभी, बैंगन, मिर्च और बेल वर्गीय फसलों सहित कई सब्जियों का उत्पादन किया जाता है। अलग-अलग फसलों पर प्रयोग करने के साथ उनका जोर सिंचाई और मिट्टी प्रबंधन को बेहतर बनाने पर भी रहता है।

गर्मी में 35 और सर्दी में 45 दिन में पहली तुड़ाई

महेंद्र के अनुसार पॉलीहाउस में खीरे की खेती का एक बड़ा फायदा यह है कि फसल अपेक्षाकृत कम समय में उत्पादन देना शुरू कर देती है। मौसम के अनुसार इसमें अंतर आता है। गर्मी के मौसम में करीब 35 दिन में पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है, जबकि सर्दियों में लगभग 45 दिन का समय लगता है।

पहली तुड़ाई के बाद नियमित रूप से खीरे तोड़े जाते हैं और उन्हें बिक्री के लिए अलवर मंडी भेजा जाता है। इससे खेत में उत्पादन का चक्र लगातार बना रहता है। महेंद्र का कहना है कि किसान के लिए केवल फसल उगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि फसल तैयार होने के समय बाजार की मांग, गुणवत्ता और बिक्री की व्यवस्था को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

एक पॉलीहाउस से 3 एकड़ तक पहुंचा खेती का सफर

महेंद्र ने वर्ष 2012 में एक पॉलीहाउस से खेती शुरू की थी। शुरुआती प्रयोगों और अनुभव के बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपने खेती के क्षेत्र का विस्तार किया। वर्तमान में करीब 3 एकड़ में आधुनिक तरीके से उत्पादन किया जा रहा है।

उनके अनुसार पिछले करीब 14-15 वर्षों से एक ही मिट्टी में लगातार खेती करने के बावजूद मिट्टी के प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया। खेती में बायोगैस की स्लरी, जीवामृत, गाय का गोबर और अन्य जैविक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। उनका प्रयास रासायनिक इनपुट पर निर्भरता को कम रखते हुए जैविक तरीकों से उत्पादन करने का है।

महेंद्र बताते हैं कि बेहतर मिट्टी प्रबंधन और जैविक सामग्री के इस्तेमाल से लंबे समय तक खेती को उत्पादक बनाए रखने में मदद मिलती है। उनके खेत में एक एकड़ क्षेत्र से अधिकतम करीब 80 टन तक खीरे का उत्पादन लिया जा चुका है।

खेती से जुड़े 8 से 10 परिवार

महेंद्र की हाईटेक खेती अब केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं है। खेत में होने वाले विभिन्न कार्यों में करीब 8 से 10 परिवार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। पौध तैयार करने, फसल की देखभाल, तुड़ाई और अन्य कृषि कार्यों में इन परिवारों के सदस्य काम करते हैं।

महेंद्र का कहना है कि आधुनिक खेती को केवल आमदनी का जरिया मानने के बजाय इसे रोजगार पैदा करने वाले माध्यम के रूप में भी देखा जाना चाहिए। उनके खेत का मॉडल इसी सोच को दर्शाता है। उनका मानना है कि खेती को तकनीक और बेहतर प्रबंधन के साथ किया जाए तो परिवार के कई सदस्य इसमें अपनी भूमिका निभा सकते हैं और आसपास के लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।

तुड़ाई की समस्या का खुद निकाला समाधान

महेंद्र ने खेती के दौरान आने वाली छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए खुद भी कई प्रयोग किए। खीरे की तुड़ाई के दौरान पहले मजदूर टोकरी या झोली में खीरे रखते थे। टोकरी भर जाने के बाद उसे खेत से बाहर ले जाकर खाली करना पड़ता था। इस प्रक्रिया में समय और श्रम दोनों अधिक लगता था।

महेंद्र ने इस समस्या का व्यावहारिक समाधान निकालते हुए अपने स्तर पर एक विशेष ट्रॉली तैयार की। इसमें एक बार में करीब 60 से 80 किलो तक खीरे रखे जा सकते हैं। इससे तुड़ाई के दौरान बार-बार खीरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की जरूरत कम हो गई। खेत में काम करने वाले लोगों के लिए भी इससे तुड़ाई का काम अपेक्षाकृत आसान हुआ।

यह छोटा सा नवाचार बताता है कि आधुनिक खेती केवल महंगी तकनीक लगाने का नाम नहीं है। खेत में रोजाना आने वाली समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान तलाशना भी हाईटेक और कुशल खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

ताजा और गुणवत्तापूर्ण खीरे की बाजार में मांग

महेंद्र के खेत में तैयार होने वाला खीरा अलवर मंडी में बिक्री के लिए भेजा जाता है। उनका कहना है कि ताजगी और अच्छी गुणवत्ता वाली सब्जियों की बाजार में मांग बनी रहती है। किसान को उत्पादन के साथ फसल की गुणवत्ता और सही समय पर बाजार तक पहुंचाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

महेंद्र के अनुसार किसानों को यह समझना होगा कि बाजार की जरूरत क्या है और किस फसल की मांग किस समय अधिक रहती है। केवल उत्पादन बढ़ाने से ही लाभ सुनिश्चित नहीं होता। फसल की गुणवत्ता, लागत, बाजार की मांग और बिक्री व्यवस्था को साथ लेकर चलना जरूरी है।

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