60 की उम्र में 281 किमी की लोटपलोट यात्रा, चरखी दादरी से बालाजी के दरबार तक आस्था का सफर
श्याम सुंदर शर्मा
अलवर। उम्र 60 साल, सामने करीब 281 किलोमीटर का रास्ता और चलने का तरीका ऐसा कि देखकर हर कोई ठहर जाए। हरियाणा के चरखी दादरी जिले के बंधवाना गांव के हनुमान मंदिर के महंत पवनदीप शर्मा इन दिनों लोटपलोट करते हुए मेहंदीपुर बालाजी की यात्रा पर हैं। आस्था और संकल्प के साथ शुरू हुई यह यात्रा करीब एक माह से जारी है। महंत रोजाना करीब छह किलोमीटर दूरी इसी तरह तय कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह यात्रा किसी निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि जनकल्याण, गौरक्षा और सनातन धर्म के उद्देश्य से की जा रही है।
21 अगस्त को बंधवाना गांव से शुरू हुई यात्रा अब अलवर पहुंच चुकी है। महेंद्रगढ़, बहरोड़, ततारपुर और जिंदोली होते हुए महंत अलवर पहुंचे हैं। यहां से उन्हें मालाखेड़ा, राजगढ़ और बांदीकुई होते हुए मेहंदीपुर बालाजी पहुंचना है।
सुबह भगवान का नाम लेकर शुरू होता है सफर
महंत पवनदीप की दिनचर्या पूरी तरह यात्रा के हिसाब से तय है। सुबह करीब छह बजे भगवान का नाम लेकर वह यात्रा शुरू करते हैं। दोपहर करीब 12 बजे तक लोटपलोट करते हुए रास्ता तय करने के बाद कुछ घंटे विश्राम करते हैं। शाम करीब पांच बजे दोबारा यात्रा शुरू होती है और रात करीब आठ बजे तक जारी रहती है।
रात में रास्ते में आने वाले मंदिरों के आसपास विश्राम किया जाता है। यात्रा के दौरान भोजन भी बेहद साधारण रखते हैं। फलाहार और हल्का भोजन लेकर वह शरीर को यात्रा के लिए तैयार रखते हैं।
8 से 10 भक्त हर समय साथ
महंत के साथ करीब 8 से 10 भक्त भी चल रहे हैं। यात्रा के दौरान पानी, भोजन और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का ध्यान यही भक्त रखते हैं। लोटपलोट करते समय जहां जरूरत पड़ती है, वहां गद्दे आदि की व्यवस्था भी की जाती है।
महंत के अनुसार भक्तों की सेवा व्यवस्था भी बदलती रहती है। कुछ भक्त पांच दिन तक साथ रहकर सेवा करते हैं और फिर दूसरे भक्त उनकी जगह जिम्मेदारी संभाल लेते हैं। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालु उनका स्वागत करते हैं और फल, फूल, प्रसाद तथा अपनी श्रद्धा के अनुसार भेंट देते हैं। हालांकि महंत का कहना है कि वह यात्रा के लिए किसी से शुल्क नहीं लेते और यात्रा का खर्च स्वयं वहन करते हैं।
बचपन से ही मंदिर और भक्ति की ओर मन
पवनदीप शर्मा बताते हैं कि उनका झुकाव बचपन से ही आध्यात्म और भक्ति की ओर रहा। वह बताते हैं कि बचपन में माता-पिता जब उन्हें स्कूल भेजते थे तो कई बार वह गांव के हनुमान मंदिर में स्कूल बैग रखकर पूजा में लग जाते थे।
पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगा तो बाद में पशु चराने जाने लगे। खेतों में मिट्टी से भगवान की आकृतियां बनाकर उनकी पूजा करते थे। धीरे-धीरे यही लगाव आध्यात्म और साधना में बदल गया। वह पिछले करीब 40 वर्षों से आध्यात्म से जुड़े हुए हैं।
उनका विवाह हुआ और उनके दो बेटे हैं। एक बेटा एयरफोर्स में नौकरी करता है, जबकि दूसरा पॉलिटेक्निक की पढ़ाई कर रहा है। परिवार भी उनके इस संकल्प में उनके साथ खड़ा है।
गुरु के आदेश पर शुरू की यात्रा
महंत पवनदीप के अनुसार इस लोटपलोट यात्रा का संकल्प उन्होंने अपने गुरु महाराज प्रभुदयाल के आदेश पर लिया। 21 अगस्त को सुबह 7:15 बजे बंधवाना गांव से यात्रा की शुरुआत की गई। उस समय बड़ी संख्या में भक्त और संगत भी मौजूद रही।
महंत बताते हैं कि पिछले चार दशक में उन्होंने कई धार्मिक यात्राएं और साधनाएं की हैं। इनमें साइकिल यात्रा, पदयात्रा और ध्वज यात्रा शामिल हैं। इस बार गुरु के आदेश पर उन्होंने लोटपलोट करते हुए मेहंदीपुर बालाजी पहुंचने का संकल्प लिया है।
बालाजी के बाद वृंदावन तक का संकल्प
मेहंदीपुर बालाजी पहुंचना इस यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं है। महंत पवनदीप का कहना है कि बालाजी के दर्शन के बाद वह वृंदावन तक भी लोटपलोट करते हुए जाने का संकल्प रखते हैं। वहां वह प्रेमानंद महाराज के दरबार में पहुंचना चाहते हैं।
उनके अनुसार प्रेमानंद महाराज से उन्हें प्रेरणा मिली है और इसी भावना से उन्होंने बालाजी के बाद वृंदावन की यात्रा करने का निर्णय लिया है।
परिवार ने कहा- पिता के संकल्प में हम भी साथ
महंत के बेटे सुमित शर्मा बताते हैं कि उनके पिता करीब 40 वर्षों से आध्यात्म से जुड़े हैं और पहले भी कई धार्मिक यात्राएं कर चुके हैं। जब उन्होंने इस बार लोटपलोट यात्रा का संकल्प परिवार को बताया तो सभी ने उनका समर्थन किया।
सुमित के अनुसार उनके पिता का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि जनकल्याण, गौरक्षा और सनातन धर्म के लिए सेवा करना है। परिवार भी इसी कारण उनके संकल्प में सहयोग कर रहा है। बड़ा भाई एयरफोर्स में नौकरी करता है और छुट्टियां खत्म होने के बाद वापस ड्यूटी पर लौट गया, जबकि वह खुद पिता के साथ यात्रा में सहयोग कर रहे हैं।
60 साल की उम्र में हर दिन करीब छह किलोमीटर लोटपलोट करते हुए आगे बढ़ता यह सफर अब केवल 281 किलोमीटर की दूरी तय करने की यात्रा नहीं रह गया है, बल्कि महंत पवनदीप के लिए यह उनके गुरु के आदेश, आस्था और वर्षों से चले आ रहे आध्यात्मिक संकल्प को पूरा करने का माध्यम बन गया है।
