फ्रांस के सहयोग से एग्रोफॉरेस्ट्री को बढ़ावा, चयनित गांवों के किसानों को निशुल्क मिलेंगे फलदार, औषधीय और बहुउपयोगी पौधे; पांच साल तक वन विभाग करेगा निगरानी
प्रेम पाठक
अलवर जिले के किसानों के लिए खेती के साथ अतिरिक्त आय का एक नया रास्ता तैयार किया जा रहा है। अब किसान अपने खेत की मेड़, खाली हिस्से या अन्य उपयुक्त स्थान पर ग्राफ्टेड फलदार, औषधीय और बहुउपयोगी पौधे लगाकर भविष्य में फल और अन्य उपयोगी उत्पाद प्राप्त करने के साथ पौधों के जीवित रहने पर प्रोत्साहन राशि भी प्राप्त कर सकेंगे। यह राशि सीधे किसान के बैंक खाते में डीबीटी के माध्यम से भेजी जाएगी।
राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना (आरएफबीडीपी) के तहत अलवर वन मंडल क्षेत्र के चयनित गांवों के पंजीकृत किसानों को 50 हजार पौधे निशुल्क वितरित किए जाएंगे। परियोजना फ्रांस की विकास एजेंसी एएफडी के सहयोग से संचालित की जा रही है। पौधे खेत में लगाने के बाद अगले पांच वर्षों तक वन विभाग उनकी निगरानी करेगा। सत्यापन के दौरान जितने पौधे जीवित पाए जाएंगे, उसी आधार पर निर्धारित प्रोत्साहन राशि किसान के बैंक खाते में भेजी जाएगी।
इस योजना का उद्देश्य किसानों को परंपरागत फसल उत्पादन के साथ एग्रोफॉरेस्ट्री से जोड़ना है, ताकि खेत की उत्पादकता और हरित क्षेत्र दोनों बढ़ें तथा किसानों के लिए दीर्घकालीन अतिरिक्त आय का विकल्प तैयार हो सके।
12 किस्मों के 50 हजार ग्राफ्टेड पौधे मिलेंगे
अलवर वन मंडल के डीएफओ ओमप्रकाश शर्मा ने बताया कि योजना के तहत किसानों को कुल 12 किस्मों के ग्राफ्टेड पौधे उपलब्ध करवाए जाएंगे। इनमें आम, नींबू, बिलपत्र, अमरूद, जामुन, चीकू, आंवला और बेर के 5-5 हजार पौधे शामिल हैं।
इसके अलावा मौसमी, कटहल, अर्जुन और सहजन के 2,500-2,500 पौधे वितरित किए जाएंगे। इस तरह कुल 50 हजार पौधे किसानों तक पहुंचाए जाएंगे।
योजना में केवल फलदार पौधों को ही शामिल नहीं किया गया है। इसमें औषधीय, पर्यावरणीय और बहुउपयोगी प्रजातियों को भी जगह दी गई है। इससे किसान अपनी जमीन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त पौधों का उपयोग कर सकेंगे।
खेत की मेड़ और खाली जमीन बनेगी अतिरिक्त आय का माध्यम
डीएफओ शर्मा के अनुसार एग्रोफॉरेस्ट्री का उद्देश्य खेत की पूरी जमीन को पेड़ों से भरना नहीं है। किसान अपनी पारंपरिक फसल की खेती जारी रखते हुए खेत की मेड़, खाली हिस्से अथवा अन्य उपयुक्त स्थानों पर फलदार और बहुउपयोगी पौधे लगा सकते हैं।
इस व्यवस्था से एक ओर किसान पारंपरिक फसलों से नियमित आय प्राप्त करता रहेगा, वहीं लगाए गए पेड़ बड़े होने के बाद फल और अन्य उपयोगी उत्पादों के माध्यम से अतिरिक्त आमदनी का साधन बन सकते हैं।
इससे खेत की उत्पादकता के साथ-साथ जिले में हरित क्षेत्र बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
पौधे मुफ्त, लेकिन पांच साल तक देखभाल की जिम्मेदारी किसान की
इस योजना में किसानों को पौधे निशुल्क दिए जाएंगे, लेकिन पौध वितरण के बाद उनकी जिम्मेदारी भी खत्म नहीं होगी। वन विभाग पांच वर्षों तक पौधों के जीवित रहने की निगरानी करेगा।
विभाग प्रत्येक किसान का रिकॉर्ड तैयार करेगा। इसमें किसान का नाम, पता, बैंक खाते की जानकारी और दिए गए पौधों की संख्या दर्ज की जाएगी। पौधे प्राप्त करते समय किसान के हस्ताक्षर भी लिए जाएंगे।
इसके बाद पौधरोपण की स्थिति और पौधों के जीवित रहने की स्थिति की समय-समय पर जांच की जाएगी। वन विभाग की टीम मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन करेगी और रिकॉर्ड में दर्ज करेगी कि किसान ने कितने पौधे लगाए तथा उनमें से कितने पौधे जीवित हैं।
पौधे जीवित रखे तो बैंक खाते में पहुंचेगी प्रोत्साहन राशि
इस योजना की सबसे खास बात पौधों के जीवित रहने से जुड़ा प्रोत्साहन है। किसान को केवल पौधा प्राप्त करने पर राशि नहीं मिलेगी। उसे पौधे की देखभाल कर उन्हें जीवित रखना होगा।
डीएफओ ओमप्रकाश शर्मा के अनुसार सत्यापन के दौरान जितने पौधे जीवित पाए जाएंगे, उसी संख्या के आधार पर निर्धारित प्रोत्साहन राशि किसान के बैंक खाते में डीबीटी के माध्यम से भेजी जाएगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को पौधों की नियमित देखभाल के लिए प्रोत्साहित करना है। इससे विभाग के पास भी पौधरोपण और पौधों के जीवित रहने का वास्तविक रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
ग्राफ्टेड पौधों में क्या खास?
डीएफओ शर्मा ने बताया कि ग्राफ्टेड पौधे विशेष तकनीक से तैयार किए जाते हैं। इसमें अच्छे फल देने वाले पौधे की डाली यानी कलम को मजबूत जड़ वाले दूसरे पौधे से जोड़कर नया पौधा तैयार किया जाता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य ऐसे पौधे तैयार करना है, जिनमें अच्छी गुणवत्ता वाले फल देने की क्षमता हो और जो सामान्य बीज से तैयार पौधों की तुलना में अपेक्षाकृत कम समय में फल उत्पादन शुरू कर सकें।
ग्राफ्टेड पौधों के जरिए किसान को लंबे समय तक केवल पौधे के बड़े होने का इंतजार करने के बजाय अपेक्षाकृत जल्दी उत्पादन का लाभ मिलने की संभावना रहती है। हालांकि फल उत्पादन का वास्तविक समय प्रजाति, स्थानीय जलवायु, मिट्टी, सिंचाई और पौध प्रबंधन पर निर्भर करेगा।
बाहर की नर्सरियों से टेंडर के जरिए खरीदे पौधे
वन विभाग के अनुसार योजना के लिए पौधों की खरीद टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से की गई है। इसके लिए अन्य राज्यों की नर्सरियों से ग्राफ्टेड पौधे मंगवाए गए हैं।
विभाग का उद्देश्य किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध करवाना है, ताकि पौधरोपण के बाद उनके जीवित रहने और भविष्य में उत्पादन देने की संभावना बेहतर रहे।
किसानों को पौधे खेत की मेड़ और उपयुक्त खाली स्थानों पर लगाने के साथ उनकी सिंचाई, सुरक्षा और नियमित देखभाल करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
पांच साल की निगरानी बताएगी योजना कितनी सफल रही
वन विभाग के लिए इस योजना की असली परीक्षा पौध वितरण के बाद शुरू होगी। योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने पौधे किसानों को बांटे गए, बल्कि यह देखना होगा कि पांच वर्षों के दौरान उनमें से कितने पौधे जीवित रहे और आगे चलकर कितने फल उत्पादन की स्थिति में पहुंचे।
इसके लिए वन विभाग पांच साल तक पौधों की निगरानी करेगा। किसानों के लिए भी यह योजना केवल मुफ्त पौधे लेने तक सीमित नहीं है। उन्हें पौधों की सुरक्षा, सिंचाई और देखभाल करनी होगी।
प्रोत्साहन राशि को पौधों के जीवित रहने से जोड़ने की व्यवस्था किसानों को इन्हें बचाने के लिए प्रेरित करेगी। यदि किसान पौधों की सही तरीके से देखभाल करते हैं तो आने वाले वर्षों में उन्हें फल उत्पादन के साथ प्रोत्साहन राशि से भी अतिरिक्त लाभ मिल सकता है।
खेती के साथ पेड़, भविष्य में दोहरा लाभ
अलवर में एग्रोफॉरेस्ट्री को बढ़ावा देने की यह पहल किसानों के लिए परंपरागत खेती के साथ अतिरिक्त आय का विकल्प तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। खेत की मेड़ और खाली हिस्सों का उपयोग फलदार और बहुउपयोगी पौधों के लिए किया जा सकता है, जबकि मुख्य खेत में किसान अपनी पारंपरिक फसलें उगा सकता है।
फलदार पेड़ों से भविष्य में उत्पादन मिलने के साथ खेत का हरित क्षेत्र भी बढ़ेगा। वहीं औषधीय और बहुउपयोगी प्रजातियां किसानों को अलग-अलग उपयोग और संभावित आय के अवसर दे सकती हैं।
इस योजना में फ्रांस की विकास एजेंसी के सहयोग, निशुल्क ग्राफ्टेड पौध वितरण, पांच वर्ष की निगरानी और जीवित पौधों के आधार पर डीबीटी प्रोत्साहन को एक साथ जोड़ा गया है। अब इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों के खेतों में लगाए गए पौधों में से कितने लंबे समय तक जीवित रहते हैं और आने वाले वर्षों में कितने पौधे उत्पादन देने की स्थिति तक पहुंचते हैं।
